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घोटाले के खेल में सालाना 1200 करोड़ रुपए के बजट से फायदा तीन कंपनियों को हो रहा

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मध्य प्रदेश में आंगनबाड़ियों को न्यूट्रिशियस डाइट सप्लाई करने के अरबों रुपए के सेंट्रलाइज्ड बिजनेस में तीन कंपनियाें का ही दबदबा है। सरकार ने इन कंपनियों के साथ 2012 में सप्लाई के लिए पांच साल का करार किया है। सालाना 1200 करोड़ रुपए के बजट से फायदा तीन कंपनियों को हो रहा है। बजट का बमुश्किल 60 फीसदी ही जरूरतमंदों तक गया है। पोषण आहार की सप्लाई महिला बाल विकास विभाग, एमपी स्टेट एग्रो और तीन कंपनियों के ताकतवर त्रिकोण से चलती रही है। कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए तत्कालीन महिला बाल विकास मंत्री कुसुम मेहदेले ने नियमों को दरकिनार कर कैबिनेट का फैसला तक बदल दिया था।
– सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2004 में आदेश दिए कि पोषण आहार की राशि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और अध्यक्ष सहयोगनी मातृ समिति के ज्वाइंट अकाउंट में जमा कराई जाए।
– इसे लागू करने में सरकार को ढाई साल से ज्यादा समय लगा। लेकिन इस फैसले को पलटने में कोई देरी नहीं हुई।
– सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जनवरी 2007 से शुरू गई व्यवस्था एक वर्ष के अंदर ख़त्म कर दी गई।
– आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहयोगिनी मातृ समितियों के बैंक खातों में भेजी जाने वाली राशि पर रोक लगा दी गई।
– मंत्रीजी ने विधानसभा में दिए गए आश्वासन की आड़ में इसे तत्काल पलट दिया और ठेकेदारों की तरफ से चलने वाले महिला मंडलों और सेल्फ हेल्प ग्रुप्स को न्यूट्रिशियस डाइट सप्लाई करने की जिम्मेदारी फिर सौंप दी।
– यह व्यवस्था लागू करवाने में मंत्री समेत पूरा महिला बाल विकास इस कदर उतावला था कि मंत्री के आश्वासन के मात्र आठ दिन बाद ही निर्देश जारी हो गए।
– तीनों कंपनियां निजी हैं, लेकिन इनके नाम के पहले एमपी स्टेट एग्रो की तर्ज पर ‘एमपी’ लगा हुआ है। इस कारण कई लोग इन्हें सरकारी उपक्रम ही समझते रहे।
कैबिनेट और वित्त विभाग से भी ऊपर कंपनियां
– इस जल्दबाजी में मेहदेले यह भूल गईं कि कैबिनेट के फैसले में बदलाव के लिए उसे मंत्रि परिषद में दोबारा ले जाना जरूरी है। यही नहीं, महिला बाल विकास विभाग ने वित्त विभाग की भी कोई राय नहीं ली।
– बदले हुए निर्देश जारी करने से पहले कैबिनेट की मंज़ूरी जरूरी थी, जो इस मामले में नहीं ली गई। विभागीय सूत्रों के अनुसार, इसके बाद ही दलिया सप्लाई में बड़े ठेकेदारों का दबदबा बढ़ने लगा। मंत्री ने कैबिनेट का फैसला बदलकर मप्र शासन के नियम 11 (एक ) और नियम 7 के आठवें निर्देश का उल्लंघन किया।
इधर देरी : 27 महीने लग गए
– सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2004 में निर्देश दिए थे कि न्यूट्रिशियस डाइट की सप्लाई में ठेकेदारी व्यवस्था तत्काल खत्म की जाए।
– कैबिनेट ने 22 जनवरी 2007 को फैसला लिया। निर्देश 15 फरवरी को जारी किए गए।
– कोर्ट के निर्देशों को लागू करने में सरकार को 27 महीनों का समय लग गया।
इधर तेज़ी : एक दिन में फैसला
– सात दिन बाद 27 मार्च को विभाग ने अफसरों को पोषण आहार की राशि बैंक खातों में जमा नहीं करने को कहा।
-31 मार्च को एक और पत्र जारी हुआ, जिसमें इस बात पर नाराजगी व्यक्त की गई कि कुछ जिलों में राशि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता एवं समिति के खातों में जमा की जा रही है।
घोटाले के खेल में अहम हैं ये 16 किरदार
रवींद्र चतुर्वेदी, जीएम, एमपी स्टेट एग्रो, 1984 से निगम में। पाठ्य पुस्तक निगम में भी रहे। विभागीय जांचें हुईं।
वेंकटेश धवलएमपी स्टेट एग्रो का एजेंडा तय करते हैं। 30 जून को रिटायरमेंट के बाद तुरंत संविदा नियुक्ति मिली।
अक्षय श्रीवास्तवऔर हरीश माथुर,आईसीडीएस के हुनरमंद अफसर। माथुर 20 साल से एक ही सीट पर हैं।
राजीव खरेऔर गोविंद रघुवंशी, क्वालिटी चेक करने वाले एडी। पोषाहार की न डिग्री है, न योग्यता।
आरपी सिंह,स्थापना शाखा में जेडी। छह साल से हैं।
– छह सीडीपीओ, फील्ड की पोस्ट है। 10-12 साल से जमे हैं। हरीश माथुरइनमें से एक हैं। इनकी आड़ में छह और सीडीपीओ यहां कई सेक्शन्स में लाए गए।
सुनील जैन, ह्दयेश दीक्षितऔर अवधेश दीक्षित,पोषण आहार की सबसे ताकतवर धुरी। इंदौर मूल के दीक्षित बंधुओं की 12 कंपनियां आयकर विभाग के रडार पर हैं।
संसद में गूंजा घोटाला, सीबीआई जांच की मांग
– शुक्रवार को यह मामला संसद में भी गूंजा। सांसदों ने घोटाले की सीबीआई जांच की मांग की। इस मामले पर संसद के बाहर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा, “प्रधानमंत्री कहते हैं कि न खाऊंगा, न खाने दूंगा, चौकीदार के रूप में काम करूंगा। अब यह स्कीम पूरी तरह केंद्र की है। क्या वे इसकी जांच कराएंगे?” उन्होंने कहा, “कांग्रेस एफआईआर कराएगी या पीआईएल लगाएगी।”
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