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‘काका-भतीजे दो जने, क्या करेंगे सौ जने’ अर्थात यदि काका और भतीजा एक साथ

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एक कहावत है- ‘काका-भतीजे दो जने, क्या करेंगे सौ जने’ अर्थात यदि काका और भतीजा एक साथ हैं तो वे 100 लोगों का भी मुकाबला कर सकते हैं, लेकिन से जिस तरह की खबरें आ रही हैं उससे यह लगने लगा है कि यहां के ‘सबसे बड़े’ काका-भतीजे यानी और ने एक-दूसरे के खिलाफ तलवारें खींच ली हैं। हालांकि इस लड़ाई की हकीकत से पर्दा उठना बाकी है, लेकिन फिलहाल तो इसे यादव कुनबे की जंग ही निरूपित किया जा रहा है। दरअसल, शिवपाल और अखिलेश यादव के मतभेद सबसे पहले मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के विलय को लेकर सामने आए थे। शिवपाल चाहते थे कि अंसारी की पार्टी का समाजवादी पार्टी में विलय हो जाए, जबकि अखिलेश यादव को यह बिलकुल भी मंजूर नहीं था क्योंकि मुख्‍तार की पृष्ठभूमि आपराधिक है। …और अखिलेश अपनी छवि ईमानदार नेता के रूप में लोगों के सामने लाना चाहते हैं इसी कड़ी में उन्होंने हाल ही में दो मंत्रियों- गायत्री प्रसाद प्रजापति और राजकिशोर सिंह को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया था। अखिलेश अपने कार्यकाल में अब तक 18 मंत्रियों को बर्खास्त कर चुके हैं, इनमें राजकिशोर और दीपक सिंघल को शिवपाल का करीबी माना जाता है। मुलायमसिंह ने यादव के दखल के बाद पांच मंत्रियों की वापसी भी हो गई थी। इसके पीछे यह भी तर्क दिया जा रहा है कि इस छद्म लड़ाई के जरिए इन दोनों दिग्गजों के आसपास जमे बरसों पुराने चेहरों को बदला जा सके।
हालांकि विपक्षी पार्टियां इस पूरी कवायद को ड्रामा करार दे रही हैं क्योंकि मायावती ने भी चुनाव से ठीक पहले खुद को पाक-साफ साबित करने के लिए अपने 10 मंत्रियों को बर्खास्त किया था, लेकिन इसके बावजूद वे सत्ता में वापसी नहीं कर पाई थीं। इस लिहाज से अखिलेश यादव उनसे भी आगे निकल गए हैं। पांच मंत्रियों की वापसी के बाद भी वे 13 मंत्रियों को बर्खास्त कर चुके हैं।
राजनीतिक जानकार यह भी कहते हैं कि अखिलेश ऐसा करके न सिर्फ खुद की ईमानदार नेता की छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं वे इस आरोप से भी पीछा छुड़ाने का प्रयास कर रहे हैं कि वे यूपी में महज ‘छाया मुख्‍यमंत्री’ हैं। असल मुख्‍यमंत्री तो मुलायमसिंह यादव, रामगोपाल यादव, शिवपाल यादव और आजम खान जैसे दिग्गज हैं। अत: काका-भतीजे की लड़ाई को चुनाव से पहले का ‘सियासी ड्रामा’ भी माना जा रहा है। क्योंकि यह भी पक्की बात है कि पार्टी में मुलायम की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, ऐसे में यादव कुनबे की कलह सड़क पर कैसे आ सकती है।
इस बीच, मुलायमसिंह यादव ने शिवपाल को राज्य संगठन का मुखिया बनाकर पॉवर को बांटने की भी कोशिश की है। अब संगठन का जिम्मा शिवपाल के पास होगा और सत्ता की बागडोर अखिलेश यादव संभालेंगे। इसमें कोई संदेह नहीं कि दोनों ही नेताओं की अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं, लेकिन परिवार की यह लड़ाई किसी के भी गले नहीं उतर रही। इसीलिए इससे चुनाव से पहले की नौटंकी माना जा रहा है।
मुलायम कराएंगे युद्धविराम : यह भी खबरें आ रही हैं कि मुलायमसिंह यादव अपने भाई और बेटे के बीज जारी जंग पर विराम लगाएंगे। इसी कड़ी में उन्होंने दोनों नेताओं को दिल्ली तलब किया है। शिवपाल जहां मुलायम से मिलने दिल्ली पहुंच रहे हैं, वहीं कहा जा रहा है कि अखिलेश दिल्ली नहीं जा रहे हैं। इसे उनकी नाराजी से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
एक बात और सामने आ रही है कि बढ़ती उम्र के चलते मुलायमसिंह की पार्टी से पकड़ ढीली होती जा रही है। यदि यह बात सही है तो चाचा-भतीजे की लड़ाई आगे और बड़ा रूप ले सकती है। इस बात को अखिलेश के इस बयान से भी बल मिलता है, जिसमें उन्होंने कहा है कि यह परिवार की लड़ाई नहीं सरकार की लड़ाई है। उन्होंने कहा कि नेताजी की बात कौन नहीं मानेगा। इसका साफ मतलब है कि कुछ तो है जो अखिलेश और शिवपाल के बीच चल रहा है। हालांकि यह हकीकत है या ड्रामा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इस लड़ाई का असर आने वाले चुनाव में सपा की संभावनाओं पर जरूर होने जा रहा है।
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