‘‘अगर रात में लड़कियां निकलेंगी तो इस तरह की घटनाएं होंगी- रेपिस्ट का बयान

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2012 के निर्भया गैंगरेप केस के दोषियों की मानसिकता किस तरह की थी, इसका अंदाजा एक रेपिस्ट के बयान से लगाया जा सकता है। जेल में बंद एक दोषी मुकेश सिंह ने एक डॉक्युमेंट्री में कहा था- ‘‘अगर रात में लड़कियां निकलेंगी तो इस तरह की घटनाएं होंगी। रेप के लिए आदमी से ज्यादा वह जिम्मेदार होगी।” बता दें कि 16 दिसंबर, 2012 की रात पैरा मेडिकल स्टूडेंट निर्भया अपने दोस्त के साथ फिल्म देखकर घर लौट रही थी। रास्ते में उससे गैंगरेप हुआ। जिस बस में निर्भया से गैंगरेप हुआ, उसे मुकेश ही चला रहा था। रेप, मारपीट और चलती बस से फेंक दिए जाने के कारण निर्भया गंभीर रूप से घायल हो गई। इलाज के लिए उसे सिंगापुर ले जाया गया। लेकिन वहां उसे बचाया नहीं जा सका।
– पिछले साल बीबीसी की डॉक्युमेंट्री ‘इंडियाज डॉटर’ को दिए इंटरव्यू में दोषी मुकेश बोला था, “आप एक हाथ से ताली नहीं बजा सकते। कोई भी शरीफ लड़की रात में नौ बजे घर के बाहर नहीं घूमेगी। उस हालत में एक लड़की रेप के लिए लड़के से कहीं ज्यादा जिम्मेदार होती है। लड़के और लड़की एक नहीं हो सकते। घर का काम और घर में रहना लड़कियों का काम है, वे रात में बार, डिस्को कैसे जा सकती हैं? भद्दे कपड़े पहन कर गलत काम करती हैं। केवल 20 पर्सेंट लड़कियां ही अच्छी होती हैं।”
वह चीखती रही बचाओ-बचाओ, विरोध नहीं करती तो जान नहीं जाती
मुकेश ने कहा था, “मैंने 15-20 मिनट गाड़ी चलाई थी। लाइटें बंद कर दी थीं बस की। मेरा भाई था मेन (मुख्य अपराधी)। लड़के (िनर्भया के दोस्त) को मारा। लड़की चिल्लाती रही- बचाओ, बचाओ। हम उसे मारपीट कर पीछे ले गए। हम आ-जा रहे थे… बारी-बारी से। लड़की विरोध नहीं करती तो उसकी जान नहीं जाती। यदि वह लड़की और उसका दोस्त बिना कुछ कहे ऐसा होने देते तो हमारा गैंग उन्हें मारता-पीटता नहीं। लड़की को घटना का विरोध नहीं करना चाहिए था। यदि वह विरोध नहीं करती तो हम घटना के बाद उसे उसके घर तक छोड़ते और केवल उसके दोस्त को ही मारते।”
मां से कहा था- सॉरी मम्मी!
निर्भया की मां कहती हैं- आखिरी बार जब हम हॉस्पिटल में मिले तो उसने हाथ में हाथ पकड़ा। कहा- सॉरी मम्मी! मैंने आपको बहुत तकलीफ दी। आय एम सॉरी। आखिरी बार घर से गई थी तो हाथ हिलाकर उसने कहा था- बाय मम्मी! मैं दो-तीन घंटे में लौट आऊंगी। उसका उस दिन घर से निकलना आज भी आंखों में दिखता है। जब हम दिल्ली से सिंगापुर जाने से पहले उसी रात को उससे मिले। उसने कहा कि इतने दिन हो गए यहां। उसने भाई से कहा कि हमें घर ले चलो। वो जितने दिन अस्पताल में थी, सोती नहीं थी। कहती थी कि आंख बंद करो तो मम्मी हमेशा लगता है कि मेरे पैरों के पास या बगल में कोई खड़ा है। मैं पास बैठती थी हाथ पकड़कर तब वो सो पाती थी।
नौ महीने में ही आ गया था पहला फैसला
निर्भया मामले में जनवरी 2013 से ही फास्ट ट्रैक अदालत में सुनवाई शुरू हुई थी। फैसला 13 सितंबर, 2013 को आया। कोर्ट ने मुकेश सिंह, पवन गुप्ता, विनय शर्मा और अक्षय ठाकुर को मौत की सजा सुनाई। दिल्ली हाईकोर्ट ने 14 मार्च, 2014 को फांसी का फैसला बरकरार रखा। लेकिन दोषियों की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल मार्च और जुलाई में चारों की फांसी पर रोक लगा दी।
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