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चीन ने NSG में भारत की मेंबरशिप को पर फिर सख्त रुख अपनाया

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चीन ने न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) में भारत की मेंबरशिप को पर फिर सख्त रुख अपनाया है। चीन ने कहा- हमारे स्टैंड में कोई बदलाव नहीं आया है। चीन के मुताबिक, एनएसजी में भारत की एंट्री तभी हो सकती है, जब एनपीटी (नॉन-प्रोलिफिरेशन ट्रीटी) देशों को लेकर रूल्स को तय किए जाएंं। या भारत इस पर साइन करे। बता दें कि एनएसजी की मीटिंग शुक्रवार को वियना में होनी है।
– चीनी फॉरेन मिनिस्ट्री के स्पोक्सपर्सन लु कांग ने कहा- ” विएना में शुक्रवार को एनएसजी की मीटिंग होगी। भारत की मेंबरशिप पर हमारा नजरिया साफ है। भारत की एंट्री नॉन-प्रोलिफिरेशन ट्रीटी (एनपीटी) पर साइन के बाद ही हो सकती है।”
– “चीन चाहता है कि एनएसजी के देश नॉन-एनपीटी देशों को लेकर अपना रुख साफ करें। हम ऐसा समाधान चाहेंगे, जो सभी नॉन- एनपीटी देशों पर लागू हो।”
– 4 नवंबर को हैदराबाद में एनएसए अजीत डोभाल और चीन के एनएसए यांग जिसी के बीच इस मुद्दे पर बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला था। इस मीटिंग का हवाला देते हुए कांग ने कहा, “इस मुद्दे पर हम भारत के साथ लगातार बात कर रहे हैं।”
क्या है एनपीटी?
– एनपीटी की घोषणा 1970 में हुई थी। 187 देशों ने इस पर साइन किए हैं। इस पर साइन करने वाले देश फ्यूचर में एटमी हथियार नहीं बना सकते। हालांकि, अमेरिका और रूस ने बाद में इस शर्त का उल्लंघन किया। लेकिन पुष्टि नहीं की।
– भारत, पाकिस्तान और इजराइल ने इस पर साइन नहीं किए हैं। नॉर्थ कोरिया भी अलग हो चुका है।
– भारत एनपीटी को भेदभाव वाला करार मानता है। उसका कहना है कि विकसित देशों ने पहले तो एटमी जखीरा बनाया और बाकी देशों पर इसके लिए दबाव बना रहे हैं।
– भारत ने फ्रांस का उदाहरण दिया। फ्रांस एनपीटी पर साइन किए बगैर एनएसजी मेंबर बना था। जबकि चीन भारत के तर्क को खारिज करते हुए कहता है कि फ्रांस तो फाउंडर मेंबर था, उसे ट्रीटी पर साइन करने की क्या जरूरत है।
शुक्र्वार को होने वाली मीटिंग में क्या होगा?
– इसमें एनपीटी पर साइन नहीं करने वाले देशों की एनएसजी में एंट्री पर दो फेज वाली प्रोसेस पर बातचीत हो सकती है।
– बता दें कि भारत के अलावा पाकिस्‍तान ने भी एनपीटी पर साइन नहीं किया है और उसने एनएसजी मेंबरशिप के लिए अप्‍लाई कर रखा है।
भारत के लिए मेंबरशिप क्यों है जरूरी?
– न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी और यूरेनियम बिना किसी खास समझौते के हासिल होगी।
– न्यूक्लियर प्लान्ट्स से निकलने वाले कचरे को खत्म करने में भी एनएसजी मेंबर्स से मदद मिलेगी।
– साउथ एशिया में हम चीन की बराबरी पर आ जाएंगे।
क्या है NSG?
– एनएसजी यानी न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप मई 1974 में भारत के न्यूक्लियर टेस्ट के बाद बना था।
– इसमें 48 देश हैं। इनका मकसद न्यूक्लियर वेपन्स और उनके प्रोडक्शन में इस्तेमाल हो सकने वाली टेक्नीक, इक्विपमेंट और मटेरियल के एक्सपोर्ट को रोकना या कम करना है।
– 1994 में जारी एनएसजी गाइडलाइन्स के मुताबिक, कोई भी सिर्फ तभी ऐसे इक्विपमेंट के ट्रांसफर की परमिशन दे सकता है, जब उसे भरोसा हो कि इससे एटमी वेपन्स को बढ़ावा नहीं मिलेगा।
– एनएसजी के फैसलों के लिए सभी मेंबर्स का समर्थन जरूरी है। हर साल एक मीटिंग होती है।
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