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मध्य प्रदेश में पोषण आहार 60 फीसदी ही बमुश्किल जरूरतमंदों तक गया

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मध्य प्रदेश में पोषण आहार सिस्टम पर सवाल खड़े हुए हैं। अरबों रुपए के इस सेंट्रलाइज्ड बिजनेस में तीन कंपनियाें का ही दबदबा है। सरकार ने पहले से काबिज इन कंपनियों के साथ 2012 में सप्लाई के लिए एकमुश्त पांच साल का करार किया है। आंगनबाड़ियों के जरिए कुपोषित बच्चों और प्रेग्नेंट महिलाओं को दी जाने वाली न्यूट्रिशियस डाइट की सप्लाई में बेहिसाब गड़बड़ियां सामने आई हैं। सालाना 1200 करोड़ रुपए के बजट से फायदा तीन कंपनियों को हो रहा है। लेकिन क्वालिटी अौर क्वांटिटी, दोनों लेवल पर खामियों के चलते बजट का 60 फीसदी ही बमुश्किल जरूरतमंदों तक गया है।
– भास्कर ने न्यूट्रिशियस डाइट के डिस्ट्रिब्यूशन के पूरे सिस्टम को स्कैन किया और पाया कि पूरा सिस्टम ही इस तरह का है कि कंपनियों को फायदा पहुंचता रहे।
– एमपी में 12 साल में 7800 करोड़ का पोषण आहार बंटा है। फिर भी शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) में मध्य प्रदेश टॉप पर है, जहां 1000 में से 51 बच्चे एक साल की उम्र पूरी नहीं कर पाते।
– एमपी के दूरदराज इलाकों में आंगनबाड़ियों के हालात अब भी बदतर हैं। फैमिली हेल्थ सर्वे की ताजा रिपोर्टें बताती हैं कि प्रदेश अब भी कुपोषण की भयावह चपेट में है।
– दूसरी तरफ सप्लाई सिस्टम पर काबिज तीन कंपनियां- एमपी एग्राे न्यूट्री फूड प्रालि., एमपी एग्रोटॉनिक्स लिमिटेड और एमपी एग्रो फूड इंडस्ट्रीज फल-फूल रही हैं।
– एमपी स्टेट एग्रो ने इनके साथ 2012 में एक साथ पांच साल का एग्रीमेंट किया।
सरकारी यूनिट का उत्पादन घटाते रहे निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाते रहे
– पोषण आहार सप्लाई में बीते दस साल में कहानी ने अलग मोड़ ले लिया। एक तरफ एमपी स्टेट एग्रो ने अपना प्रोडक्शन लगातार घटाया, दूसरी तरफ निजी कंपनियों की बेहिसाब चांदी कटी।
– सालाना रिपोर्टें बताती हैं कि एमपी स्टेट एग्रो के बाड़ी प्लांट का प्राेडक्शन 2005-06 में 4775 मीट्रिक टन सालाना था, जो 2008-09 तक घटकर 1877 मीट्रिक टन रह गया।
– इसके उलट एमपी एग्रो न्यूट्री फूड की कैपिसिटी 2005 में 3816 मीट्रिक टन से बढ़कर इसी टर्म में 11,019 मीट्रिक टन हो गई।
– एमपी एग्रोटॉनिक्स 2007-08 में 5076 मीट्रिक टन की कैपिसिटी के साथ शुरू हुई यह यूनिट अगले ही साल 5902 मीट्रिक टन पोषण आहार बना रही थी।
बदलाव की पहल नाकाम कर दी
एमपी स्टेट एग्रो के जीएम रवींद्र चतुर्वेदी शुरू से सिस्टम में बदलाव के खिलाफ थे। आईसीडीएस के एक अफसर ने कुछ साल पहले गड़बड़ियों को पकड़ा तो इसे बदलने की पहल की। नोटशीट लंबी चली। चतुर्वेदी ने बदलाव के विरोध में लंबी दलीलें दीं। भास्कर के पास वे दस्तावेज मौजूद हैं, जिनमें यह दिलचस्प बहस दर्ज है कि किस तरह एमपी एग्रो हर हाल में सप्लाई अपने हाथों में रखना चाहता था। बाद में उस अफसर का तबादला हो गया और फिर सब ऐसे ही चलता रहा।
आखिर किसके पेट में गया कुपोषितों का पोषण आहार…
शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) में मध्य प्रदेश टॉप पर है, जहां 1000 में से 51 बच्चे एक साल की उम्र पूरी नहीं कर पाते। कुपोषण में मध्य प्रदेश बिहार के बाद दूसरे नंबर पर है, जहां 42.8 फीसदी बच्चे इस घातक सीमा में हैं।
बच्चों-महिलाओं के हाल 2005-06 2015-16
कम वजन के बच्चे 60 42.8
ठिगने बच्चे 50 42
बच्चों में खून की कमी 74.1 68.9
महिलाओं में खून की कमी 56 52.5
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कॉन्ट्रैक्टरों से न कराएं
– मध्य प्रदेश में सुप्रीम कोर्ट के कमिश्नरों के सलाहकार सचिन जैन कहते हैं कि प्रदेश में शुरू से ही ठेकेदारों और कंपनियों का वर्चस्व रहा। यह सु्प्रीम कोर्ट के 2004 के आदेश का उल्लंघन था। हम हाईकोर्ट में गए। सरकार ने कहा कि वह चार दिन एसएचजी से पोषण आहार की सप्लाई के लिए तैयार है। दो दिन कंपनियों से सप्लाई लेंगे। 11 साल से ज्यादा हो गए। मगर आज भी तीन कंपनियां 12 सौ करोड़ के पोषण आहार की सप्लाई पर काबिज हैं।
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