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सुप्रीम कोर्ट रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार वापस भेजने के मुद्दे पर 13 अक्टूबर को सुनवाई करेगा

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मंगलवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि वह इस मामले दोनों पक्ष इमोशनल पहलू पर बहस से बचें, सिर्फ कानूनी पहलू पर ध्यान दिया जाएगा। पिछली सुनवाई में केंद्र सरकार ने 18 सितंबर को रोहिंग्या के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में 16 पन्नों का हलफनामा दाखिल कर कुछ कारण बताए थे। तब राजनाथ ने कहा कि जो भी फैसला होगा वो कोर्ट के मुताबिक होगा। बता दें कि दो रोहिंग्या शरणार्थियों ने केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ पिटीशन फाइल की है।

 

– सीजेआई जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने मंगलवार को कहा, ”इस मामले में सभी पक्ष इमोशनल पहलू पर बहस से बचें, सिर्फ कानूनी पहलू पर ही ध्यान दिया जाएगा। ये केस मानवता से जुड़ा है और सुनवाई में आपसी सम्मान की जरूरत है।”

 

– बेंच ने ये भी कहा, ”रोहिंग्या पर सरकार के रुख समेत कई पहलुओं पर सुनवाई की जाएगी। सरकार का तर्क है कि यह मामला कोर्ट में सुनवाई करने के लायक नहीं है।”
– कोर्ट ने दोनों पार्टियों (केंद्र और दो रोहिंग्या शरणार्थियों) से कहा कि सभी केस से जुड़े दस्तावेज और इंटरनेशनल कंवेशन की जानकारी कोर्ट को सौंपी जाए ताकि इनसे मदद मिल सके।
 वकीलों ने क्या कहा?
– रोहिंग्या शरणार्थियों की ओर से पेश हुए वकील फली नरिमन ने सरकार के फैसले का विरोध किया। उन्होंने कहा कि संविधान के आर्टिकल 32 के तहत दायर पिटीशन पर विचार किया जा सकता है, क्योंकि संविधान व्यक्तिगत अधिकारों की गारंटी देता है।
– एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार नहीं चाहती है कि केस को टुकडों में सुना जाए। वह एक ही दिन में डिटेल से सुनवाई चाहती है।
 # सरकार ने रोहिंग्या को ना रखने की 5 वजह बताई थीं
 1) रोहिंग्या गैरकानूनी तौर पर देश में घुसे
– केंद्र में अपने एफिडेविट में कहा है कि रोहिंग्या मुस्लिम म्यांमार से भारत में गैरकानूनी तौर पर घुसे हैं। लिहाजा, वो इलीगल इमिग्रेंट्स हैं।
 2) नेशनल सिक्युरिटी के लिए खतरा
– सरकार का कहना है कि रोहिंग्या मुसलमानों का यहां रहना देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे पैदा कर सकता है। इनके पाकिस्तान में मौजूद आतंकी गुटों से रिश्ते हैं।
3) फंडामेंटल राइट्स इनके लिए नहीं
– हलफनामे के मुताबिक- फंडामेंटल राइट्स सिर्फ देश के नागरिकों के लिए होते हैं, ताकि वो भारत में जहां चाहें सेटल हो सकें। इलीगल रिफ्यूजी सुप्रीम कोर्ट के सामने जाकर इन अधिकारों को पाने का दावा नहीं कर सकते।
 4) खतरा क्या? सीलबंद लिफाफे में बताएगी सरकार
– हलफनामे में सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों से पैदा होने वाले खतरों पर ज्यादा तफसील से कुछ नहीं बताया। तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि वो नेशनल सिक्युरिटी को होने वाले खतरों के बारे में एक सीलबंद लिफाफे में तमाम जानकारी देंगे।
5) स्टेटस ऑफ रिफ्यूजी कन्वेंशन का हिस्सा नहीं है भारत
– हलफनामे में कहा गया है कि भारत स्टेटस ऑफ रिफ्यूजी कन्वेंशन (1951 और 1967) का हिस्सा नहीं है। ना ही इस पर भारत ने दस्तखत किए हैं। लिहाजा, इससे जुड़े कानून या शर्तें भी मानने के लिए भारत मजबूर नहीं है।
 रोहिंग्या मुस्लिमों का मुद्दा गरम
– म्यांमार में लगातार रोहिंग्या मुस्लिमों पर हो रहे टॉर्चर ने दुनिया का ध्यान खींचा है। भारत समेत यूएन भी इस मामले पर अपनी नजर बनाए हुए हैं।
– आंकड़ों के मुताबिक, अब तक करीब 400 रोहिंग्या मुस्लिम की हत्या हो चुकी है। जान बचाने के लिए पहाड़ों और नदियों के रास्ते म्यांमार को पार कर बांग्लादेश और भारत की ओर आ रहे हैं।
– भारत सरकार ने कहा कि रोहिंग्या मुस्लिम अवैध प्रवासी हैं और इसलिए कानून के मुताबिक उन्हें बाहर किया जाना चाहिए। गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने इस मसले पर कहा था, “कोई भी भारत को ह्यूमन राइट्स और शरणार्थियों की सुरक्षा के बारे में नहीं सिखा सकता।” बता दें कि भारत से रोहिंग्या लोगों को बाहर किए जाने के प्रस्ताव के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर की गई है और इसे संविधान के दिए अधिकारों का उल्लंघन बताया गया है।
 मसले से भारत क्यों जुड़ा?
– म्यांमार से आए रोहिंग्या मुस्लिम दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर शरण देने की मांग कर रहे थे। वहीं, सरकार ने देश में अवैध रूप से मौजूद 40 हजार से अधिक रोहिंग्या लोगों को वापस उनके देश म्यांमार भेजने की प्रॉसेस शुरू की। म्यांमार की आर्मी की कथित ज्यादतियों के चलते रोहिंग्या मुस्लिमों को भारत और बांग्लादेश जैसे देशों में शरण लेनी पड़ी। रोहिंग्या जम्मू, हैदराबाद, हरियाणा, यूपी, दिल्ली-एनसीआर में रहते हैं।
– सुप्रीम कोर्ट में रोहिंग्या शरणार्थियों की तरफ से दायर एक पिटीशन में मो. सलीमुल्लाह और मो. शाकिर ने कहा कि रोहिंग्या मुस्लिमों का प्रस्तावित निष्कासन संविधान आर्टिकल 14(समानता का अधिकार) और आर्टिकल 21 (जीवन और निजी स्वतंत्रता का अधिकार) के खिलाफ है। इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में 11 सितंबर को होनी है।
 कौन हैं रोहिंग्या?
– इतिहासकारों के मुताबिक, रोहिंग्या म्यांमार में 12वीं सदी से रहते आ रहे मुस्लिम हैं।
– अराकान रोहिंग्या नेशनल ऑर्गनाइजेशन ने कहा, “रोहिंग्या हमेशा अराकान में रहते आए हैं।
– ह्यूमन राइट वाच के मुताबिक, 1824-1948 तक ब्रिटिश रूल के दौरान भारत और बांग्लादेश से प्रवासी मजदूर म्यांमार में गए, क्योंकि ब्रिटिश एडमिनिस्ट्रेटर्स के मुताबिक म्यांमार भारत का हिस्सा था इसलिए ये प्रवासी देश के ही माने जाएंगे।
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