About us

पत्रकारिता और कारोबारी जमात की नायाब और बेनजीर शख्सियत भास्कर पत्र समूह के चेयरमैन रमेशजी

0
भास्कर पत्र समूह के चेयरमैन। पत्रकारिता और कारोबारी जमात की नायाब और बेनजीर शख्सियत। अपने-परायों के बीच भाई साहब के नाम से पहचान। हमेशा सफारी सूट में नजर आते। उनके व्यवहार का कमाल था कि लाल जाजम पर चलने वाले भी उनके मुरीद थे। आला से लेकर अदना तक की पहुंच रमेशजी तक थी। यकीन नहीं आता कि रमेशजी ने बुधवार 12 अप्रैल को नश्वर संसार को अलविदा कह दिया।
– अब थोड़ा फ्लैश बैक में चलें तो आपको बताता चलूं कि बड़े सेठजी यानी सेठ द्वारका प्रसाद अग्रवाल ने भोपाल से 1954-55 में प्रकाश नाम से अखबार निकाला। यह बात मेरे ख्याल से चुनिंदा लोगों को मालूम होगी। ये अखबार तकरीबन तीन साल प्रकाशित हुआ। इसके बाद कोतवाली रोड से उन्होंने दैनिक भास्कर की शुरुआत 13 अगस्त 1958 को की थी।
– अखबार का हर लफ्ज कभी ऐसा न रहा कि किसी को डिक्शनरी देखना पड़े। इन बातों को बड़े सेठजी बहुत बारीकी से जानते समझते थे। इसलिए खबरों को पेश करने के तरीके में हिंदी जुबान में बोलचाल के लफ्जों को अहमियत दी गई।
– बहुत कम लोग वाकिफ होंगे कि भोपाल के बाहर रमेशजी को अखबार के लिए पहला विज्ञापन धीरुभाई अंबानी ने वर्ष 1978 में दिया था। तब यह विज्ञापन पांच हजार रुपए का था।
– सेठ द्वारका प्रसाद अग्रवाल जी का तर्जुबा, रमेशजी की सोच के चलते बुंदेखखंड के मजबूत पाएदार जिले की पहचान रखने वाले झांसी और ग्वालियर से दैनिक भास्कर छपने लगा। इसी के चलते महाकाल का आशिर्वाद मिला तो उज्जैन से भी पब्लिकेशन शुरू हो गया।
ऑफसेट का आइडिया दिया
– इस सफर में ही रमेशजी को माडर्न टेक्नोलॉजी की अहमियत समझ में आने लगी। रमेशजी ने बड़े सेठजी को ऑफसेट का आइडिया दिया तो उन्होंने फौरन ही ओके कर दिया।
– इसके बाद टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल की शुरुआत भोपाल से हुई तो तब मप्र के तत्कालीन सीएम वीरेंद्र कुमार सकलेचा ने 1978 में इसका शुभारंभ किया।
– ऑफसेट प्रिंटिंग से काले अक्षर सफेद कागज पर ओर बेहतर नजर आने लगे। इस बीच रमेशजी ने 1980 में भोपाल भास्कर में कम्प्यूटर कम्पोजिंग का इस्तेमाल शुरू किया तो अखबार का कलेवर ही बदल गया।
– मुझे अच्छे से याद है कि मेंबर ऑफ पार्लियामेंट कमलनाथ 1982 में कोतवाली रोड स्थित भास्कर के दफ्तर में रमेशजी से मिलने आए तो भास्कर में कम्प्यूटर के इस्तेमाल और प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी को देखकर दंग रह गए। तारीफ करने से खुद को नहीं रोक सके।
– इसके बाद 1983 में रमेशजी की अगुवाई में इंदौर से भास्कर छपने लगा। इंदौर में मिली तारीखी कामयाबी के बाद भास्कर ने पलटकर नहीं देखा।
गंगा-जमुनी तहजीब का हिमायती
– भास्कर शुरू से गंगा-जमुनी तहजीब का हिमायती रहा। 1992 में जब भोपाल की फिजा बिगड़ी तो भास्कर की कवरेज की प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया तक ने तारीफ की। भास्कर अल्लाहमा इकबाल के उसे तराने का हिमायती है, जिसमें कहा गया है- मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना।
– भास्कर ने जलसों के जरिए लोगों को जिंदगी के सूफियान और रुमानी रंग से वाकिफ कराया। सामाजिक सरोकार की अहमियत को समझते हुए भास्कर ने पानी बचाअो (जल सत्याग्रह) की जो मुहिम मुल्क में चलाई, उसकी हर जगह तारीफ हुई। इसके मद्दे नजर कई सूबे में हुकूमत ने वाटर रिचार्जिंग को अपनाया, जिसकी बदौलत बूंद-बूंद पानी सहजने का काम हो रहा है। इसके अलावा पर्यावरण की खातिर पौधरोपण कार्यक्रम और गर्मियों में पक्षियों की प्यास बुझाने सकोरे बांटने से लेकर अन्नदान, वस्त्रदान आदि का अभियान भी चलाया।
– भास्कर अब अखबार के साथ-साथ हमारा रहनुमां भी है। रमेशजी ने फानी दुनिया को अलविदा कह दिया है। लेकिन वे अब भी हैं, हमारे अहसास और यादों में। उनका इकबाल हमेशा बुलंद रहा और रहेगा।
 उर्दू का अखबार आफताब-ए-जदीद भी निकाला…
रमेशजी को हिंदी जुबान की तरह उर्दू से भी मोहब्बत थी। उन्होंने वर्ष 1977 आफताब -ए-जदीद नाम का उर्दू अखबार निकाला। इस अखबार के जरिए उन्होंने उर्दू की खिदमत की। तकरीबन 20 साल छपने के बाद ये अखबार कुछ वजहों से बंद हो गया। इसके बाद अंग्रेजी में नेशनल मेल के नाम से भोपाल से अखबार प्रकाशित हुआ। लेकिन कुछ वर्षों बाद इसका प्रकाशन बंद हो गया। भास्कर मराठी और गुजराती में भी अखबार निकाल रहा है।
Share.

About Author

Leave A Reply