48 देशों के ग्रुप एनएसजी की मीटिंग 20 से 24 जून के बीच साउथ कोरिया में होगी

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अमेरिका ने न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में भारत को मेंबरशिप दिलाए जाने की कोशिशें तेज कर दी हैं। उसने एलीट ग्रुप के मेंबर्स से कहा है कि वो भारत को इस ग्रुप की मेंबरशिप दिलाने में मदद करें न कि इसमें रुकावटें खड़ी करें। 48 देशों के ग्रुप एनएसजी की मीटिंग 20 से 24 जून के बीच साउथ कोरिया में होगी। इसी में भारत के बारे में फैसला हो सकता है।
– गुरुवार रात एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान यूएस स्टेट डिपार्टमेंट के स्पोक्सपर्सन जॉन किर्बी ने एक सवाल के जवाब में कहा- अगले हफ्ते या जब भी एनएसजी की मीटिंग हो तो वो भारत को मेंबरशिप दिलाने की कोशिशों का समर्थन करें। अमेरिका भारत को मेंबरशिप देने की एप्लीकेशन का समर्थन करेगा।
– किर्बी ने कहा, ‘‘अभी मैं यह नहीं बता सकता कि यह कैसे होगा और ना ही मैं कोई अटकल लगा सकता हूं कि किस तरह से इसे किया जाएगा, लेकिन हमने यह साफ किया है कि हम भारत का समर्थन करेंगे।’’
– बता दें कि पिछले हफ्ते नरेंद्र मोदी अमेरिकी विजिट पर थे। बराक ओबामा ने इसी दौरान साफ कर दिया था कि अमेरिका चाहता है कि भारत को एनएसजी की मेंबरशिप दी जानी चाहिए और उनका देश इसके लिए कोशिशें तेज करेगा।
– कुछ दिन पहले अमेरिकी फॉरेन सेक्रेटरी जॉन केरी ने भी एनएसजी के कई मेंबर देशों के फाॅरेन मिनिस्टर्स से बात कर भारत का सपोर्ट करने की अपील की थी।
Q&A: कब होगा फैसला?
भारत की मेंबरशिप को लेकर कब तक हो सकता है कोई फैसला?
– 20 से 24 जून के बीच साउथ कोरिया में।
भारत को कब से मिली है छूट?
– भारत को एनएसजी मेंबर्स को मिलने वाली सुविधाएं 2008 से मिल रही हैं। तब भारत-अमेरिका के बीच सिविल न्यूक्लियर डील हुई थी।
कितना यूरेनियम इम्पोर्ट किया हमने?
– 3,700 मीट्रिक टन यूरेनियम। फ्रांस, रूस और कजाकिस्तान से 2009 के बाद से इम्पोर्ट किया जा चुका है। इससे न्यूक्लियर प्लांट्स की जरूरतें पूरी करने में मदद मिली है।
भारत किन देशों से लेता है यूरेनियम?
– फ्रांस, रूस, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, अमेरिका, नामिबिया, अर्जेंटीना, चेक रिपब्लिक, द. कोरिया, वियतनाम, श्रीलंका और कनाडा से यूरेनियम इम्पोर्ट करने का करार है।

– कितने न्यूक्लियर रिएक्टर हैं हमारे देश में?
– 21 न्यूक्लियर पावर रिएक्टर हैं देश में। इनकी कुल क्षमता 5,780 मेगावाॅट है। इनमें 13 रिएक्टर इंटरनेशनल न्यूक्लियर एजेंसी की निगरानी में हैं।

– भारत को क्या फायदा होगा?
– भारत को न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी और यूरेनियम बिना किसी खास समझौते के हासिल होगी। न्यूक्लियर प्लांट्स से निकलने वाले कचरे को खत्म करने में भी एनएसजी मेंबर्स से मदद मिलेगी। दक्षिण एशिया में भारत चीन की बराबरी पर आ जाएगा।
– अमेरिका साथ क्यों?
– इसके पीछे अमेरिका की डिप्लोमैसी और ट्रेड पॉलिसी है। वो भारत को चीन की बराबरी पर लाना चाहता है। वहीं वो भारत में तीन एटमी रिएक्टर भी लगाने जा रहा है। इसके लिए जरूरी न्यूक्लियर मटैरियल भारत को आसानी से मिल सकेगा।
– भारत के फेवर में क्या बातें?
– सबसे बड़ी बात है अमेरिका का भारत के फेवर में खुलकर आना। वो कई देशों को चिट्‌ठी लिख चुका है। सदस्य देशों के लिए अमेरिका की राय को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा। विरोध में खड़े छोटे देशों को राजी करने का जिम्मा खुद अमेरिका ने उठा रखा है।

– भारत की मेंबरशिप से चीन को क्या दिक्कत?
– अगर भारत मेंबर बना तो साउथ एशिया में भारत का दबदबा काफी बढ़ जाएगा। भारत को हमेशा अपने से कम आंकने वाला चीन उसे अपनी बराबरी पर नहीं देखना चाहता। पड़ोस में अमेरिकी दखल भी बढ़ जाएगा।

– क्या एनएसजी सदस्यता के लिए एनपीटी पर दस्तावेज जरूरी है?
– नहीं, फ्रांस एनएसजी का सदस्य है। उसने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत नहीं किए थे। इसी तरह, जापान फाउंडर मेंबर है और उस समय तक उसने भी एनपीटी पर दस्तखत नहीं किए थे। अर्जेंटीना और ब्राजील भी बिना एनपीटी पर साइन किए जुड़े।
– भारत के दावे की मजबूती का आधार क्या है?
– भारत के परमाणु सिद्धांत के प्रमुख तीन तत्व हैं- पहला प्रयोग नहीं (नो फर्स्ट यूज), न्यूनतम परमाणु प्रतिरोधन और निःशस्त्रीकरण (डिसआर्मामेंट)। यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर के भी अनुरूप है। भारत इससे बंधा है कि वह ऐसे देशों, जो कि न्यूक्लियर पावर नहीं हैं, उन पर एटमी हमला नहीं करेगा।
– सबसे बड़ा फायदा क्या होगा?
– अगर भारत को एनएसजी मेंबरशिप मिल जाती है तो इससे उसका रुतबा बढ़ जाएगा। ये न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप वर्ष 1974 में भारत के एटमी टेस्ट के बाद ही साल 1975 में बना था। यानी जिस क्लब की शुरुआत भारत का विरोध करने के लिए हुई थी, अगर भारत उसका मेंबर बन जाता है तो ये उसके लिए एक बड़ी कामयाबी होगी।
– चीन नहीं माना तो?
– वैसे, यहां वीटो वाला मामला नहीं है। लेकिन एनएसजी की एकमात्र शर्त है- आम सहमति। इसलिए उसका मानना जरूरी है। सीधे दबाव बनाने के साथ-साथ चीन अब पाकिस्तान जैसे छोटे देशों को भी उकसा रहा है। इनमें से न्यूजीलैंड पैंतरा बदलकर भारत के पक्ष में आ गया है। अब सिर्फ तुर्की, दक्षिण अफ्रीका, आयरलैंड, ऑस्ट्रिया अड़े हैं। संभावना है तुर्की और अफ्रीका भी साथ आ सकते हैं।
– क्यों बना था ये ग्रुप?
– 1974 में जब इंदिरा सरकार ने न्यूक्लियर टेस्ट (स्माइलिंग बुद्धा) किया था, तो दुनिया के टॉप-7 देशों (अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा, जापान और सोवियत संघ) ने भारत को सबक सिखाने के लिए एनएसजी बनाया था। चीन बाद में शामिल हुआ था। लेकिन आज ये सभी सातों देश चाहते हैं कि भारत इस ग्रुप का सदस्य बन जाए। केवल चीन ही बड़ा देश है जो विरोध में है।
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