About us

एलएनसीटी के मैकानिकल इंजीनियरिंग फोर्थ ईयर स्टूडेंट ने एक ऐसा तरीका ईजाद किया है जिससे मिसाइल में ज्यादा विस्फोटक ले जा सकेंगे

0

डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाजेशन (डीआरडीओ) की ‘डेयर टु ड्रीम’ प्रतियोगिता में शहर के युवा मैकेनिकल इंजीनियर पीयूष चतुर्वेदी के मैकेनिज्म को भी सराहा गया है। उन्होंने एक ऐसा तरीका ईजाद किया है जिससे मिसाइल में ज्यादा विस्फोटक ले जा सकेंगे। उन्होंने मिसाइल में लगे पंख (फिंस) को अनलॉक करने वाली मैकेनिज्म तैयार की है, जिसे इन पंखों के अंदर ही फिट किया जा सकेगा। डिफेंस और एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में होने वाले प्रयोगों को प्रोत्साहित करने के लिए डीआरडीओ यह प्रतियोगिता कराता है। इसी के तहत दिसंबर 2018 में इस प्रतियोगिता की घोषणा की गई थी। इसके लिए देशभर के अलग-अलग शहरों से 20 प्रतिभागियों के आइडिया को सम्मान के लिए चुना गया, जिसमें पीयूष भी शामिल रहे। पीयूष को केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और तीनों भारतीय सेनाओं के प्रमुखों की उपस्थिति में लेटर ऑफ रिकग्निशन प्रदान किया गया। वह एलएनसीटी में मैकानिकल इंजीनियरिंग फोर्थ ईयर स्टूडेंट हैं। उनके पिता अनिल चतुर्वेदी गवर्नमेंट कॉलेज रायसेन में लैब टेक्निशियन हैं। मां इंद्रा होममेकर हैं।
पीयूष कहते हैं- पहले यह समझा कि मौजूदा मिसाइलों की समस्या क्या है..
पीयूष ने बताया कि, किसी भी नई तकनीक के बारे में सोचने के पहले यह बहुत जरूरी था कि मैं पहले यह समझूं कि आज के समय में जिन तकनीकों का इस्तेमाल हो रहा है, उनमें समस्या क्या है। चुनौती में सिर्फ यह कहा गया था कि बेहतर अनफोल्डिंग मैकेनिज्म तलाशना है, जो छोटा हो। लेकिन, वर्तमान तकनीक से क्या-कुछ समस्याएं आ रही हैं, उसका जिक्र नहीं था।मैंने करीब 15 दिनों तक दुनियाभर में रक्षा विभागों द्वारा किस तरह की तकनीकों वाली मिसाइल का इस्तेमाल किया जा रहा है, इसके बारे में पढ़ा। समझ में आया कि, वर्तमान में मिसाइल के पंखों को खोलने के लिए जिन तकनीकों का इस्तेमाल होता है, वे दो तरह के हैं- एक जो मिसाइल के अंदर लगाए जाते हैं और पंखों को खोलने का काम करते हैं। लेकिन, यह तकनीक मिसाइल के अंदर काफी जगह घेरती है। वहीं, दूसरी तकनीक मिसाइल के पंखों के ऊपर लगाई जाने वाली रबर क्लिप से जुड़ी है, जिससे मिसाइल की एयरोडायनेमिक्स बिगड़ती है।  मैंने ऐसी तरीका ढूंढ़ निकाला, जिससे मिसाइल के पंख के भीतर ही ऐसी डिवाइस लगा सकते हैं जो पंखों को खोलने का काम करे। यह पंखों के भीतर होने के कारण मिसाइल के एयरोडायनेमिक्स को नहीं बिगाड़ती। मिसाइल के भीतर का स्थान जो पारंपरिक तकनीक में बेकार जा रहा था, बच जाएगा। इस तकनीक से भारत के मिसाइल खाली बची जगह में ज्यादा विस्फोटक अपने साथ ले जा सकेंगे और ज्यादा घातक बन जाएंगे। इसको मौजूदा मिसाइल में भी पंखों में छोटे से बदलाव के साथ उपयोग किया जा सकता है। तकनीक के इस्तेमाल के लिए पूरा का पूरा मिसाइल नया बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे मौजूदा मिसाइल्स की क्षमता बढ़ा सकते हैं। इस प्रतियोगिता में प्रतिभागियों को कुछ चुनौतियों के हल ढूंढ़ने थे। इन चुनौतियों में से एक थी मिसाइल के पंखों को खोलने के लिए इस्तेमाल होने वाली बेहतर तकनीक ढूंढ़ना। दरअसल मिसाइल के पंख (फिंस) मुड़े हुए होते हैं, उन्हें खोलने के लिए दो तरह के डिवाइस इस्तेमाल होते रहे हैं- एक मिसाइल के अंदर रहता है जो ज्यादा जगह घेरता है या पंख पर ही होता है, लेकिन इससे मिसाइल के उड़ने पर असर पड़ता है। पीयूष ने जो मैकेनिज्म बनाया उससे मिसाइल के अंदर ज्यादा जगह होगी और एयरोडायनेमिक्स भी नहीं बिगड़ेगा।

Share.

About Author

Leave A Reply