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चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग के नोटिस को खारिज करने का फैसला सोच-समझकर किया – वेंकैया नायडू

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उप राष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडूका कहना है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग के नोटिस को खारिज करने का फैसला सोच-समझकर किया। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के 10 वकीलों के एक ग्रुप से बातचीत के दौरान यह टिप्पणी की। यह ग्रुप नायडू के फैसले से सहमत है। नायडू ने कहा कि उन्होंने सही समय पर और बिना जल्दबाजी में फैसला लिया है। बता दें कि कांग्रेस ने इस फैसले को गैर-कानूनी करार दिया था।

वही किया जो सबसे संभावित तरीका था

– वेंकैया नायडू ने कहा कि कुछ लोग मेरे फैसले को जल्दबाजी में लिया गया बता रहे हैं। नायडू ने कहा, ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मंजूरी है, लेकिन अंत में सत्य की ही जीत होती है। मैंने वही किया है जो उस समय सबसे संभावित तरीका था।’

– नायडू ने कहा कि उनका फैसला संविधान के सख्त प्रावधानों और न्यायाधीशों से (पूछताछ) अधिनियम, 1968 के अनुरूप है। न्यायाधीशों से (पूछताछ) अधिनियम, 1968 की धारा 3 कहती है कि राज्यसभा का सभापति प्रथम दृष्टया आरोपों पर विचार करेगा। उसके पास इसे स्वीकार करने या खारिज करने का अधिकार होगा।
– नायडू ने कहा, मैंने अपना काम किया और मैं इससे पूरी तरह संतुष्ट भी हूं। यह फैसला बिल्कुल समय पर और सोच-समझकर लिया गया है।

पहले भी ऐसा मामला सामने आया था

– नायडू से मुलाकात के दौरान वकीलों ने उन्हें बताया कि पहले भी इसी तरह का एक नोटिस सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस जेसी शाह के खिलाफ दिया गया था। तब लोकसभा के तत्कालीन स्पीकर जीएस ढिल्लन ने उसे खारिज कर दिया था। जस्टिस जेसी शाह बाद में सीजेआई भी बने थे।

कांग्रेस ने जल्दबाजी में लिया गया फैसला करार दिया था

– वेंकैया नायडू के फैसले पर कांग्रेस ने कड़ी आपत्ति जताई थी। उसके नेता कपिल सिब्बल ने कहा था कि सभापति ने इस मामले में जांच कराए बिना ही नोटिस खारिज कर दिया। उनका यह फैसला जल्दबाजी में लिया गया है।

वेंकैया ने कहा था- प्रस्ताव तर्कसंगत नहीं
– चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा के खिलाफ लाया गया महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस सोमवार को एम. वेंकैया नायडू ने खारिज कर दिया था। इसमें कहा गया है कि नोटिस में चीफ जस्टिस पर लगाए गए आरोपों को मीडिया के सामने उजागर किया गया, जो संसदीय गरिमा के खिलाफ है। साथ ही कहा गया है कि उन्होंने तमाम कानूनविदों से चर्चा के बाद पाया कि यह प्रस्ताव तर्कसंगत नहीं है। बता दें कि इस नोटिस पर विपक्ष के 64 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे और उन्हें हटाने के लिए 5 वजहों को आधार बनाया था।

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