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ज्योतिरादित्य सिंधिया दशहरे के समय राजवंश की रॉयल परंपराओं का पालन करते

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सिंधिया राजवंश के मौजूदा वारिस ज्योतिरादित्य सिंधिया दशहरे के समय राजवंश की रॉयल परंपराओं का पालन करते हैं। सिंधिया इस दिन महाराज बन जाते हैं, और शाही पोशाक पहनकर गोरखी पैलेस पहुंचते हैं। यहां विजयादशमी पर खासतौर पर होने वाली शस्त्र पूजा करते हैं।
– गोरखी पैलेस में विजयादशमी की पूजा, ग्वालियर में उस समय से चली आ रही है, जब से यहां सिंधिया राजवंश का शासन था।
– सिंधिया राजवंश का प्रत्येक शासक इस परंपरा का पालन करता आ रहा है। मौजूदा वारिस ज्योतिरादित्य सिंधिया भी इस दिन राजनेता से महाराजा बन जाते हैं।
– इस दिन ज्योतिरादित्य सिंधिया राजनेता के तौर पर आम दिनों की तरह पहने जाने वाले अपने सादा कुर्ता-पायजामा को छोड़, राजसी पोशाक में जयविलास पैलेस से गोरखी परिसर पहुंचते हैं।

विधिविधान से करते हैं पूजा
– गोरखी परिसर में सिंधिया के कुलदेवता का मंदिर है। इस मंदिर में सिंधिया विधिविधान से पूजा करते हैं, इस दौरान मराठा सरदार भी उनके साथ रहते हैं।
– पूजा खत्म कर मराठा सरदार उनका आशीर्वाद लेने के लिए बाकायदा शाही परंपरा के तौर पर झुक कर मुजरा करते हैं।
– पूजा के बाद सिंधिया वापस जयविलास पैलेस पहुंचते हैं, दशहरे का का दरबार भी लगाते हैं।
– इस दरबार में मराठा सरदारों के वंशजों को ही जाने की अनुमति है। इसके अलावा कुछ गणमान्य नागरिकों भी इस शाही दरबार में आमंत्रित किया जाता है।

– दरबार के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया मराठा सरदारों और अपने पुत्र महाआर्यमन के साथ कुलदेवी मांढरे की माता मंदिर में पहुंच कर आशीर्वाद लेते हैं।
– मंदिर से निकल कर परिसर में ही लगे शमी वृक्ष की पूजा करते हैं, और प्रजा को स्वर्ण मुद्रा लुटाने के प्रतीक रूप में शमी के पत्ते उड़ाते हैं।
– आमजन और मराठा सरदारों के परिवार स्वर्ण मुद्रा के तौर पर बांटे जाने वाले शमी के पत्तों को लूटने के लिए टूट पड़ते हैं।
– इसे साल भर सहेज कर रखते हैं, और मानते हैं कि यह पत्ता उनके लिए पूरे साल समृद्ध बनाए रखेगा।
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