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सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर केंद्र की पुनर्विचार याचिका पर 10 दिन में सुनवाई की जाएगी

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एससी/एसटी एक्ट मामले में दायर पुनर्विचार याचिका पर खुली अदालत में सुनवाई की। करीब एक घंटे तक चली सुनवाई में बेंच ने कहा- “हमने एससी-एसटी एक्ट के किसी भी प्रावधान को कमजोर नहीं किया है। लेकिन, इस एक्ट का इस्तेमाल बेगुनाहों को डराने के लिए नहीं किया जा सकता।” कोर्ट ने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर केंद्र की पुनर्विचार याचिका पर 10 दिन में सुनवाई की जाएगी। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दलित संगठनों ने सोमवार को भारत बंद का आह्वान किया था। इस दौरान 10 से ज्यादा राज्यों में प्रदर्शन हिंसात्मक हुआ और 14 लोगों की मौत हो गई।

फायदे के लिए लोगों को गुमराह किया गया- सुप्रीम कोर्ट

– जस्टिस एके गोयल और जस्टिस यूयू ललित ने कहा, “जो लोग विरोध कर रहे हैं, उन्होंने शायद फैसले को पूरी तरह नहीं पढ़ा है। कुछ लोगों ने अपने फायदे के लिए दूसरों को गुमराह किया है। हम एससी-एसटी एक्ट के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन किसी बेगुनाह को गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए।”

– “एक्ट के किसी भी प्रावधान को कमजोर नहीं किया जा सकता है। इसके तहत एफआईआर दर्ज होने से पहले भी ज्यादती का शिकार हुए कथित पीड़ित को मुआवजा दिया जा सकता है। हमने केवल 7 दिन की सीमा तय की थी, जिसके भीतर आरोपों की जांच पूरी कर ली जाए।”

– सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर 10 दिन बाद सुनवाई करेगी। अदालत ने सभी पार्टियों को 2 दिन के भीतर जवाब देने को कहा है।

लोकसभा में राजनाथ सिंह के बयान पर हंगामा

– गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत बंद के दौरान हिंसा पर मंगलवार को लोकसभा में बयान दिया।

– उन्होंने कहा- ” देश के कई हिस्सों में हिंसा और आगजनी की घटनाएं हुई हैं। इन हिंसक घटनाओं में 8 लोगों की मौत हुई है। मध्यप्रदेश में 6, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में एक-एक की मौत हुई है।”

– ” सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई में भारत सरकार पार्टी नहीं थी। संविधान में एससी/एसटी के लोगों को पूरी तरह से प्रोटेक्शन दिया गया है और सरकार इसके लिए प्रतिबद्ध है। हमारी सरकार ने इस एक्ट में कोई भी डॉयल्यूशन नहीं किया है।”

– राजनाथ सिंह के बयान के दौरान विपक्षी सांसद ‘हमें न्याय चाहिए’ जैसे नारे लगाते रहे।

तत्काल सुनवाई के लिए सरकार ने हिंसा और जनहानि का हवाला दिया

– सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इससे पहले कहा था कि वो खुली अदालत में सुनवाई को तैयार हैं। लेकिन यह केस उसी बेंच के पास जाना चाहिए, जिसने यह फैसला किया था। कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से कहा था कि बेंच के गठन के लिए चीफ जस्टिस के सामने केस मेंशन करें।
– इसके बाद सीजेआई दीपक मिश्रा ने ओरिजल बेंच को गठित करने के राजी हो गए जिसने एससी/एसटी फैसला सुनाया था।

– इससे पहले अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट के सामने भारत बंद के दौरान जनधन हानि का हवाला दिया और फौरन सुनवाई की मांग की।

एससी/एसटी एक्ट के मामले में वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं:

1) एससी/एसटी कानून में कहां पुलिस से शिकायत हुई थी
– महाराष्ट्र में शिक्षा विभाग के स्टोर कीपर ने राज्य के तकनीकी शिक्षा निदेशक सुभाष काशीनाथ महाजन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। स्टोर कीपर ने शिकायत में आरोप लगाया था कि महाजन ने अपने अधीनस्थ उन दो अिधकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगा दी है, जिन्होंने उसकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में जातिसूचक टिप्पणी की थी।

2) पुलिस से शिकायत होने के बाद कैसे आगे बढ़ा मामला
– पुलिस ने जब दोनों आरोपी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए उनके वरिष्ठ अधिकारी महाजन से इजाजत मांगी, तो वह नहीं दी गई। इस पर पुलिस ने महाजन पर भी केस दर्ज कर लिया। महाजन का तर्क था कि अगर किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति के खिलाफ ईमानदार टिप्पणी करना अपराध हो जाएगा तो इससे काम करना मुश्किल जो जाएगा।

3) एफआईआर के बाद हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में केस कब से
– 5 मई 2017 को काशीनाथ महाजन ने एफआईआर खारिज कराने हाईकोर्ट पहुंचे। पर हाईकोर्ट ने उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया। एफआईआर खारिज नहीं हुई तो महाजन ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। इस पर शीर्ष अदालत ने 20 मार्च को उन पर एफआईआर हटाने का आदेश दिया।

4) सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को फैसले में क्या कहा था
– सुप्रीम कोर्ट ने फैसले के साथ आदेश दिया कि एससी/एसटी एक्ट में तत्काल गिरफ्तारी न की जाए। इस एक्ट के तहत दर्ज होने वाले केसों में अग्रिम जमानत मिले। पुलिस को 7 दिन में जांच करनी चाहिए। सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी अपॉइंटिंग अथॉरिटी की मंजूरी के बिना नहीं की जा सकती।

5) क्यो फैसले का विरोध शुरू हुआ, सरकार ने क्या किया
– इस फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। दलित संगठनों और विपक्ष ने केंद्र से रुख स्पष्ट करने को कहा। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की।

 6) आखिर इस फैसले के विरोध क्यों हो रहा है
– दलित संगठनों का तर्क है कि 1989 का एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम कमजोर पड़ जाएगा। इस एक्ट के सेक्शन 18 के तहत ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है।
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